दो पुरानी कहानियां -Must Read

बताया हूं न कि दो दिनों तक दो पुरानी कहानियां आपको सुनानी हैं। इसकी एक बड़ी वज़ह है। इन कहानियों को लिख कर मैं खुद ही भूल चुका था। पर अब खुद भी याद कर रहा हूं आपको भी याद दिला रहा हूं।
कहानी दुबारा क्यों सुना रहा हूं, इसे फिर कभी बताऊंगा।
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कई साल पहले एक रात हमारे घर की घंटी बजी।
तब हम पटना में रहते थे।
आधी रात को कौन आया?
पिताजी बाहर निकले। सामने दो लोग खड़े थे। एक पुरूष और एक महिला। हमारे घर के बरामदे में लोहे की ग्रिल लगी थी, जिसमें हम रात में ताला बंद कर देते और पूरा घर सुरक्षित हो जाता।
पिताजी ने ताला खोला। पूछा कि आप लोग कौन हैं, कहां से आए हैं। उन्होंने पिताजी के हाथ में एक चिट्ठी पकड़ाई। पिताजी ने चिट्ठी पढ़ी और खुश हो गए। उन्होंने आवाज़ देकर बुलाया, संजू बेटा बाहर आओ देखो ये लोग फलां जगह से आए हैं। इन्हें तुम्हारी बुआ ने भेजा है।
“बुआ ने भेजा है? वाह!”
अब हमारे लिए ये जानना ज़रूरी नहीं था कि वो कौन हैं, कहां से आए हैं।
उन्हें हमारी बुआ ने भेजा था, यही जान लेना बहुत बड़ी बात थी। सर्दी की वो रात थी, फटाफट उनके सोने के लिए एक बिस्तर का इंतजाम किया गया। हम दोनों भाई दो रजाइयों में लिपटे थे, हमारी एक रजाई ले ली गई और कहा गया कि दोनों भाई एक ही रजाई में घुस जाओ। एक रजाई नए मेहमान को देनी है। हमें याद है, हम पहली बार उनसे मिल रहे थे। पिताजी ने अपनी बड़ी दीदी और उनके पूरे परिवार का हाल पूछा। और ये जान लिया कि वो उनके जानने वाले हैं। मतलब हमारे रिश्तेदार नहीं, बुआ के जानने वाले हैं।
उनके साथ जो महिला थीं, उनकी तबीयत थोड़ी खराब थी और पटना मेडिकल कॉलेज-अस्पताल में उनका इलाज होना था। क्योंकि वो मेरी बुआ को जानते थे, और बुआ के छोटे भाई का परिवार पटना में था इसलिए ये तो सोचने की बात ही नहीं थी कि वो कहां जाएंगे। वो बिना किसी पूर्व सूचना के हमारे घर पहुंच गए थे। उनकी ट्रेन आनी तो शाम को थी, लेकिन ट्रेन के टाइम से न चलने का बुरा कौन मानता है।
ट्रेन बहुत लेट पहुंची थी और हमारे वो मेहमान बिना खाना-पीना खाए आधी रात में हमारे घर पहुंच गए थे। फटाफट खाना बना। सोने का जुगाड़ हुआ।
और सुबह उन्हें अस्ताल पहुंचाने का भी।
वो कोई हफ्ता भर हमारे घर रहे। हम खूब घुल-मिल गए। हम रोज साथ खाते और मस्ती करते। ऐसा लग रहा था मानों हम सदियों से एक दूसरे को जानते रहे हों। बुआ ने तिल की मिठाई भेजी थी। बुआ सारे संसार का ख्याल रखती थीं। भाई-भतीजे में तो उनकी आत्मा ही बसती थी।
उन्होंने अपने परिचित भेज दिए, हमने उन्हें रिश्तेदार बना लिया।
आप जान कर हैरान रह जाएंगे कि हम दुबारा कभी उस रिश्तेदार से नहीं मिल पाए, जो उस रात हमारे घर आए थे। लेकिन हम सब भाई बहनों के जेहन में उस रिश्ते की याद आज भी ताजा है। हम आज भी उनके आने और अपनी रजाई छिन जाने को याद कर खुश होते हैं।
जब मैं पच्चीस साल पहले भोपाल से दिल्ली नौकरी करने आया था तो मेरे मामा ने एक चिट्ठी अपने एक जज दोस्त के नाम लिख कर मुझे भेज दिया था। दिल्ली के किदवई नगर में वो रहते थे और मैं चिट्ठी लेकर उनके घर पहुंच गया। यकीन कीजिए जितने दिन उनके घर रहा, परिवार के एक सदस्य की तरह रहा। उनकी बेटियां मेरी बहनें बन गईं और उनका बेटा मेरा भैया। मुझे दफ्तर से आने में देर होती, तो वो चिंतित होते।
तब हमारे पास रिश्ते थे। लेकिन अब मैं जब सोचने बैठता हूं तो यही सोचता हूं कि क्या सबके पास रिश्ते हैं? क्या सचमुच रिश्ते हैं?
“अकेले में हम सिर्फ बोल सकते हैं, लेकिन जब हम रिश्तों के बीच होते हैं तो बातें करते हैं। अकेले में हम मजे कर सकते हैं, लेकिन जब हम रिश्तों के बीच होते हैं तो उत्सव मनाते हैं। अकेले में हम मुस्कुरा सकते हैं, लेकिन रिश्तों के बीच हम ठहाके लगाते हैं।”
ध्यान रखिएगा कि ये सब सिर्फ इंसानी रिश्तों में मुमकिन है।
आपके संजय सिन्हा रोज-रोज रिश्तों की कहानियां सिर्फ इसलिए लिखते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि आज आदमी सबके बीच रह कर भी अकेला हो गया है। सारे रिश्ते हैं, लेकिन कोई रिश्ता बचा नहीं है। हम सब अपनी ज़िंदगी जीने की तैयारी में इतने व्यस्त हो गए हैं कि हमारे पास खुद के लिए वक्त नहीं रहा।
अब संजय सिन्हा कहीं जाते हैं तो होटल बुक कराते हैं। पता नहीं सारे रिश्ते कहां चले गए।
आप में से अगर किसी के पास बुआ के उस पड़ोसी का कोई रिश्ता बचा हो, तो यकीनन आप भाग्यशाली हैं।
मेरा क्या है, मैं तो अपने उसी भाग्य की तलाश में हर रोज मुंह उठाए आपके पास पहुंच जाता हूं।
story from #SanjaySinha fb wall